बुधवार, 31 जनवरी 2018

'Bolo Gangaputra' deals questions of history, power truth and dharma : Tarinee

The tradition of reconsidering and recasting characters from Indian epics in(to) contemporary genric forms, and considering contemporary problems through them is hardly a new phenomenon. Not only do Indian epics form the source material for a wide range of texts in premodern India, but literature and other media during the pre- and post-Independence periods have also relied on these characters to grapple with and express contemporary questions. 

Dr. Pawan Vijay’s novel is located within this pre-existing tradition. Taking a sympathetic view towards Mahābhārata characters generally portrayed as a darker grey than the others (there is hardly any black or white in the Mahābhārata) has also been a trend within a lot of more recent literature. Of course, at one point there was a school of scholarly thought that held that the present-day Mahābhārata is in fact a reworked version of an epic which was actually in praise of the Kauravas. Of course, this has been contested and is rarely held; in any case, it is the Mahābhārata as we have it is what has constituted as one of the foundational narratives for our arts and literatures. 

Vijay’s novel is set after the Mahābhārata war is over, as Bhīṣma lies alone in the battlefield; this, too, has illustrious precursors, not least in ‘Dinkar’, whose long poem in seven cantos, Kurukshetra, also revolves around a conversation with Bhīṣma. However, in Vijay’s novel, the interlocuter is Time/Death himself, and Bhīṣma is the protagonist. Through sharp questions, which perhaps Bhīṣma was already grappling with, Kala compels Bhīṣma to think carefully about the decisions he made through his long, illustrious life.  Vijay has tried to bring in the relationship between narrative and teleology, and argues that the reason why the Pāṇḍavas are deemed to be on the side of dharma is that they won the war. Of course, this seems to overlook the way the Mahābhārata ends; the point of the Mahābhārata is precisely that nobody won the war, even the victors. The text and the tradition which surrounds it also censures the Pāṇḍavas in great measure, rendering parts of Vijay’s critique a little blunt. Some of Bhīṣma’s criticism of Vidura also seems a little contrived.

Conceptually, he has tried to make a point for privileging emotion over the intellect. This, however, is somewhat undermined by Kala’s earlier exhortation for Bhīṣma to view things objectively rather than subjectively. There is also a larger stylistic and narrative choice Vijay makes, which seems to potentially confuse matters. For the most part, the novel deals with larger questions of history, power, truth, dharma et cetera. However, it often slips into the specifics of the Mahābhārata plot and the specific socio-cultural or customary factors that may have determined decisions in the time. These parts suffer from a lack of rigour in terms of the existing literature on these questions. One can’t but wonder if the novel might have read better if it refrained from getting into these matters. 

Vijay has tried to combine a Sanskritized Hindi with a relatively more familiar idiom, and there are times when the former seems somewhat belaboured. It is perhaps when Krishna is being spoken of that Vijay really shines, and as in the Sanskrit Bhagavadgītā itself, it is there that the contradictions of Vijay’s position seem to resolve themselves, in surrender. This surrender, which characterizes the Bhagavadgītā as well, marks the end of the novel, and opens up the possibility of transcending the conflicts which taint Bhīṣma’s last days. Even so, there doesn’t emerge a way of conducting oneself through life as Bhīṣma does in death, either for Bhīṣma, or from him.  Vijay’s true merit lies in his participation in the tradition of recasting epic traditions, and his ability to bring in his post-structuralist, anti-foundationalist, tendencies in this recasting, while at the same time preserving the sacred; Vijay’s Bhīṣma embodies the contradictions of the post-colonial intellectual perfectly.

Tarinee Awasthi
Cornell University
USA. 
Book is available on Amazon link
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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

महाभारत जारी है: 'बोलो गंगापुत्र' (bolo gangaputra)पर डॉ. प्रशांत त्रिपाठी की टिप्पणी



व्याख्या और पुनर्व्याख्या की सुस्थापित भारतीय परम्परा में एक और प्रस्तुति हमारे हाथ में है। पाठ और प्रघटना की व्याख्या-पुनर्व्याख्या सहज मानवीय स्वभाव है, किन्तु अपने सर्वाधिक सुव्यवस्थित एवं सहज स्वीकार्य रूप में इसे भारतीय परम्परा में ही देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति के जिस सातत्य ने सदा अध्येताओं का ध्यान आकृष्ट किया है उसका मूल कारण व्याख्या - पुनर्व्याख्या का यहाँ संस्थात्मक रूप में स्थापित रहना ही है। विभिन्न ऐतिहासिक युगों में संक्रमण का आधार यहाँ युद्ध से अधिक वैचारिक मंथन रहा है। अश्वमेध यज्ञ हुए हैं तो धर्मचक्र प्रवर्तन और शंकर के दिग्विजय की भी भूमिका रही है। इस परम्परा का सुन्दरतम उदाहरण महाभारत के रूप में प्राप्त होता है। महाभारत को समझने का प्रयास समस्त भारतीय परम्परा के बोध का सबसे सीधा रास्ता है। महाभारत एक ग्रन्थ या पाठ के रूप में और एक घटना के रूप में सदा जीवंत है। यह उच्चतम सिद्धांतों से लेकर निरक्षर जन तक हेतु एक सन्दर्भ बिंदु है। महाभारत मात्र अठारह अक्षौहिणी योद्धाओं का युद्ध नही वरन यह कुरुक्षेत्र तो गाँव गली घर से व्यक्ति के अंतर्मन तक व्याप्त है। आज भी जब एक अति सामान्य व्यक्ति कहता है – “आज घर में महाभारत हो गया है”, तो कथन किसी व्याख्या की मांग नही करता । हजारों वर्षों से जन मन में रचा बसा ऐसा पाठ और ऐसी घटना अन्यत्र दुर्लभ ही है।

महाभारत का सारग्राही स्वरुप इसे महान ही नही बल्कि सर्वोपयोगी बनाता है। महाभारत(रामायण सहित) वे महाकाव्य हैं जो पुस्तकों और विद्वानों के मष्तिष्क में नही बल्कि कोटि कोटि हृदयों में नित रचे और समाये जाते हैं जैसा कि ए. के. रामानुजन मानते हैं कि भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में कोई भी कभी रामायण या महाभारत को पहली बार नही पढता, कथाएं वहां पहले से ही मौजूद होती हैं। कहने की आवश्यकता नही कि कथन उपर्युक्त की जीवन्तता उसकी पुनर्व्याख्या पर निर्भर है।

पुनर्व्याख्या की प्राचीन परम्परा को आगे बढाते हुए पवन ने भी इस जीवन्तता में योगदान दिया है । प्रत्येक कथाकार, प्रत्येक व्याख्याता अपने इर्द गिर्द की महाभारत के आईने से सर्वाधिक कथा की पुनर्रचना करता है। कथाकार के चहुँ ओर व्याप्त महाभारत ही एक नये महाभारत की रचना करवाता है। अबकी बार कुरुक्षेत्र में अर्जुन नही बल्कि मृत्युजयी भीष्म सवालों के घेरे में खड़े हैं। कालजय और अमरत्व की तृष्णाओं का आविर्भाव होता है। सवालों के जवाब खोजने का प्रयास होता है। जवाब मिलते हैं , नही भी मिलते हैं, प्रश्न तिरोहित होते हैं पुनः अवतरित होते हैं – युद्ध हो रहा है। महाभारत जारी है । काल अपनी गति के साथ यात्रा कर रहा है।

सहिष्णुता और असहिष्णुता की मौजूदा बहस के दौर में महाभारत के प्रचलित आदर्शों मान्यताओं और निष्कर्षों पर डॉ. पवन ने जिस तरह से सवाल उठाये हैं वह एक महत्वपूर्ण बात है। दरअसल ये सवाल आम जन मानस में पहले से ही हैं किन्तु उन्हें जानने और समझने की जगह नेपथ्य ही रहा है। पहली बार लेखक ने उन्हें मंच प्रदान किया है अब यह सुधी पाठकों और समीक्षकों पर निर्भर करता है कि वह इस नये दृष्टिकोण को किस तरह से पुनर्व्याख्या करते हैं।

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डॉ. प्रशांत त्रिपाठी


(विभागाध्यक्ष: समाजशास्त्र एवं प्रख्यात भारत विद्याशास्त्री )

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

'बोलो गंगापुत्र!'




'बोलो गंगापुत्र!'
डॉ पवन विजय
‘अंत में धर्म की विजय होती है।’, ऐसा इसलिए कहा जाता है ताकि अन्तिम परिणाम को न्यायोचित ठहराया जा सके। वस्तुत: राजनीति में ‘विजय ही धर्म’ है। राजकुल में सत्ता ही सत्य, धर्म और नैतिकता है। जब हम इसका अवलोकन, महाभारत के सन्दर्भ में देखते हैं, तो सत्ता के कुचाल स्पष्ट हो जाते हैं। धर्म के नाम पर, वचन के नाम पर, और राज्य की सुरक्षा के नाम पर जितने अधर्म कुरुवंश में किये गये, उसका अन्यत्र उदाहरण मिलना दुष्कर है। गंगापुत्र भीष्म - जिनके संरक्षण में द्रौपदी को परिवारी जनों के सामने नग्न करने का प्रयास किया गया, एकलव्य का अँगूठा कटवा लिया जाता है, दुर्योधन को एक उद्दण्ड, हठी चरित्र बनाकर घृणा का पात्र बना दिया जाता है, इतना बड़ा नरसंहार होता है, और कुरु कुल का विनाश हो जाता है; वह गंगापुत्र, काल के प्रश्नों सामने अधीर हैं, किन्तु काल के प्रश्न उनके शरीर में बाणों की तरह धँसे हैं, जिनका उत्तर उन्हें देना ही है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें, कि धर्म की ओर कौन सा पक्ष था। दरबारी इतिहासकारों द्वारा जो लिखा होता है, वह मात्र सत्ता का महिमामण्डन होता है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। सत्ता के इतर लिखने वालों को सत्ता समाप्त कर देती है; नहीं तो यह कैसे हो सकता है कि जयसंहिता में जो कुछ आठ हजार आठ सौ श्लोकों में लिखा गया, उसे बढ़ाकर, एक लाख श्लोक का महाभारत बना दिया जाता है। सत्ता द्वारा धर्म और सत्य को, जाने कितने क्षेपकों की दीवारों में चुनवा दिया गया। कुलप्रमुख धृतराष्ट्र और भीष्म के पूर्वाग्रहों में आश्चर्यजनक एकरूपता है... एक का दुर्योधन के प्रति, तथा दूसरे का पाण्डवों के लिए आग्रह है।
‘बोलो गंगापुत्र!’ में काल, अपने कपाल पर लिखे सत्य का साक्षात्कार भीष्म से कराता है। अबकी बार कुरुक्षेत्र में अर्जुन नहीं, बल्कि मृत्युजयी गंगापुत्र भीष्म दुविधाग्रस्त हैं, सवालों के घेरे में हैं। पुस्तक, संवाद के क्रम में है, जिसके द्वारा लेखक ने सामान्य लौकिक मानवीय प्रश्नों को अत्यंत सहजता से उठाया है, और उसके सरलतम उत्तर भी पात्रों के माध्यम से देने का प्रयास किया है।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

मानव होने के अधिकार से वंचित किन्नर

                
सामान्यतः हम जिस परिवेश में रहते हैं उसी के हिसाब से हमारे तौर तरीके विकसित हो जाते हैं जिसके अनुसार  हम ताउम्र व्यवहार करते हैं या सोचते हैं।  मनुष्य की आदतें उसके सीखने और सामंजस्य करने पर आधारित होती हैं।  जो एक बार सीख गया या जीवन में जहां जैसे भी सामंजस्य बिठा लिया उसी के मुताबिक़ वह आदत बना लेता है और  जिसे बदलना या बदलने के लिए सोचना उसके लिए बहुत मुश्किल होता है।  सदियों से लैंगिंक विभेद के रूप में पुरुष और स्त्री का विमर्श चला आ रहा है। उभय लिंग और नपुंसक लिंग की भी चर्चा गाहे बगाहे हो जाती है किन्तु पुरुषों या स्त्रियों की लैंगिक विकृतता को लेकर कोई  विमर्श या चर्चा नही अगर होती है तो भी उसे हास परिहास में टाल दिया जाता है । इस प्रकार के लोगों को तीसरी श्रेणी के लोग कहकर औपचारिकता का निर्वहन कर लिया गया।  तीसरी श्रेणी के लोगों ने भी समाज की इस रीति के साथ सामंजस्य बनाकर जीना सीख लिया।  समाज ने किन्नरों को सामजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्य, खेल  समेत  सारे मामलों में हाशिये पर रखा।  सामजिक व्यवस्था ऐसी है जिसमे  मात्र लैंगिक विकृति के चलते किसी व्यक्ति को मानव होने के लायक ही नही समझा जाता।  किन्नर होना अपराधी, घृणित और अस्पृश्य होना समझा गया या उन्हें देवत्व से जोड़कर समाज से बाहर रखने का पूरा इंतजाम किया गया।  किसी परिवार में यदि कोई विकलांग बच्चा जन्म लेता है तो उसे परिवार उसके जीवनपर्यंत सामजिक सुरक्षा देता है जबकि लैंगिक विकलांग के पैदा होते ही उसके माता पिता उसे त्याग देते हैं या त्यागने पर मजबूर हो जाते हैं।  किन्नरों के लिए बधाई समूह ही एकमात्र विकल्प है जिसमे रह कर वे अपना जीवन निर्वाह कर सकते हैं।  समाज ने गाने बजाने  वाले किन्नरों को मान्यता दी तथा उन्हें शुभ बताया ताकि वह अपने पेशे को दैवीय समझें और उसी में ही लिप्त रहें।  
यहाँ इस बात को जानना अत्यधिक जरुरी है कि क्या वाकई में किन्नरों को  तृतीय लिंग कहना चाहिए।  तृतीय लिंगकी संविधानिक अवधारणा और कानूनी मान्यता के अनुसार  “स्व-पहचानीकृत लिंग या तो पुरुषया महिलाया एक तृतीय लिंग हो सकता है। किन्नर  तृतीय लिंग के रूप में ही जाने जाते हैं, न कि पुरुष अथवा स्त्री के रूप में। इसलिए इनकी अपनी लिंगीय अक्षमता को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समूह के कारण एक तृतीय लिंग के रूप में विचारित किया जाना चाहिए।“ किन्तु लिंगीय अक्षमता तो अनेक पुरुष और महिला दोनों हो सकते हैं तो क्या उन्हें भी तृतीय लिंग में शामिल कर लेना चाहिए।  जाहिर है कि किन्नर के लैंगिक  पहचान को लेकर विरोधाभास है।  वस्तुतः किन्नर गर्भ में शरीर के विकास क्रम की वह अवस्था है जब किसी  एक लिंग के निर्धारण की प्रक्रिया होते होते रुक जाती है या कुछ समय बाद दूसरे लिंग का विकास होना शुरू हो जाता है।  इस प्रकार किन्नर के अंग में पुरुष या स्त्री के अंग अविकसित रह जाते हैं या दोनों अंगों का मिलावटी स्वरुप हो जाता है।  स्पष्ट है कि इन्हें तीसरे लिंग में रखना एक कामचलाऊ बात है।  किन्नर होना एक लैंगिक विकृति है न कि कोई  अलग लिंग का प्राणी होना है।  जब हम इन्हें अलग से तीसरे लिंग  की कोटि में रखते हैं तो अनजाने में ही उन्हें यह जताते  है कि वह सामान्य मानव नही हैं बल्कि कुछ विचित्र किस्म के लोग हैं।
शरीर की बनावट के आधार पर समाज की मुख्यधारा से दूर किन्नरों को महिला का वेश बनाकर रहना और उनके जैसी बोली भाषा और व्याकरण का प्रयोग करने की बाध्यता भी उन्हें दलित बनाती है. स्त्री को दोयम दर्जा देने के बाद लगभग उसी तरीके से किन्नरों को लांक्षित अपमानित कर उन पर निर्योग्यताएं लादी गयीं और यह सुनिश्चित किया गया कि वह उन निर्योग्यताओं का अनुपालन करेगे. इस आधार पर अच्छे बुरे किन्नरों का निर्धारण किया गया. मध्यकाल में किन्नरों से शासक वर्ग को कुछ सहूलियतें मिलीं खासतौर से मुग़ल शासनकाल के दौरान उन्हें हरम में जगह इसलिए मिली ताकि निश्चिंतता के साथ वहाँ का देखरेख और निगरानी की जा सके. वर्तमान समय में संविधान ने भारत के प्रत्येक नागरिक को लिंग के आधार पर भेदभाव से मुक्ति दिलाने की बात करता है परन्तु सामाजिक व्यवस्था और सोच कुछ इस तरह की है कि उससे पार पाना अत्यंत मुश्किल काम  है. सबसे कठिन काम प्रचलित परिदृश्य को बदलना है जिसमे किन्नर को एक विचित्र प्राणी समझा जाता है. किन्नरों पर यह विचित्रता समाज द्वारा आरोपित है जिसे उस वर्ग ने स्वीकार कर उसके मुताबिक़ अपने जीवन को ढाल लिया है और परिणाम यह कि हजारों वर्षों  से वह मानव जीवन को महसूस करने के प्रथम मानवाधिकार से वंचित है।  

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रविवार, 13 अगस्त 2017

मैं पूजित होने के लिए कब तक अभिशप्त रहूंगा

मैं पत्थर हूँ 
न देखता हूँ न सुनता हूँ 
न ही कोई संवेदना महसूस करता हूँ 
किसी के दुःख निवारण  की बात तो दूर 
मैं इतना असहाय हूँ कि पड़ा हुआ हूँ सदियों से एक ही  जगह बारहों मौसम 
सोचो मुझे पूजने वालों 
अगर मैं कहने सुनने समझने और  करने वाला होता तो पत्थर  क्यों होता 
इंसान क्यों न होता 
जिस दिन मुझे बोलना आ गया 
उसी दिन मंदिर से बाहर फेंक दिया जाऊंगा और देवत्व से भी च्युत कर दिया जाऊंगा 
क्योंकि बोलते बोलते मुझे चिल्लाना होगा  और चिल्लाते चिल्लाते हांफने लगूंगा 
पसीने से तरबतर 
लेकिन देवताओ को तो  पसीना आता ही नही 
मेरी देह  से पसीना बहते देख लोग समझ जाएंगे कि 
यह देवता नही कोई इंसान  है 
और लात मारकर निकाल देंगे अपने अपने घर के पवित्र कोनों से
बोलने  वाले माँ  बाप की तरह 
सुनो मुझे पूजने वालों 
मैं पूजित होने के लिए कब तक अभिशप्त रहूंगा 
मुझे मुक्त होना है 
इस गूंगे बहरे लूले लंगड़े और निहायत ही लिजलिजे  और निर्जीव  देवत्व से
मैं सांस लेना चाहता हूँ 
हँसना चाहता हूँ रोना चाहता हूँ 
मुझे पूजने वालों 
मैं तुम जैसा होना चाहता हूँ  

रविवार, 2 जुलाई 2017

प्राण नगरी छोड़ आया

जो रचे थे स्वप्न सारे चित्र उनको तोड़ आया।
देह केवल शेष है मैं प्राण नगरी छोड़ आया।

उम्र  भर  की वेदना  श्वांसों  में  है
बांसुरी अपनी कथा किससे कहेगी
मोर  पंखों  ने  समेटा  चन्द्रमा  को
वृंदावन  में राधिका  पागल फिरेगी

पूर्णिमा को युग युगांतर अमावस से जोड़ आया
देह  केवल   शेष  है  मैं प्राण नगरी छोड़ आया।

फूल से छलनी  हृदय  की  अकथ  पीड़ा
रो  पड़ा  है  सुन  के  जाता  एक  बादल
स्नेह की  इक बूँद  को  दल  में  समेटे
ताल में कुम्हला गया धूप से भींगा कमल

पार जाती  नाव  की  मैं  पाल को  मरोड़ आया
देह   केवल  शेष है मैं  प्राण  नगरी छोड़ आया।

प्यास  ही  तैरेगी  अधरों पर निरंतर
शाप से मुरझा गया जल आचमन का
यह  प्रतीक्षा  है प्रलय  की रात  तक
पायलें  देंगी  संदेशा  आगमन   का

जा रही सागर को गंगा फिर हिमालय मोड़ आया
देह  केवल  शेष  है  मैं प्राण  नगरी  छोड़  आया।